Friday, 16 December 2016

हसो, हसाओ।।

© चन्द्रहासः।


हसते रहो हसाते रहो
सिसकि मत सूनाओ।
चिर कितना भी फंटे
उसको फूलों से बुनाओ।।

ग्रीष्म भले हीे गहरा हों
मुख पर बसन्त दिखाओ।
नयनों से झलकता पानी हों
तुम वर्षा का जल ही बताओ।।

कभी हेमन्त शिशिर हों
तुम शरद ही दिखलाओ।
अन्तर से मत मुरझाओ
बाहर खिल कर ही जाओ।।

मेघों की गडगडाहट हों
तुम मृदंग की ध्वनि बताओ।
अन्तर मे यदि यमन हों
तुम भैरव के स्वर ही गाओ।।

पक्ष कृष्ण हों शुक्ल हों
तुम मन की उपज हों।
विराट को नमन करते
चन्द्र, तुम हसो हसाओ।।
 
जय श्रीकृष्ण!!!

 अभिन्न जिससे वृन्दावन।।

© चन्द्रहासः।

मनुष्य रोता है अच्छी बात है
रोने से ही तो पता चलता है
कि मन अभी जीवित है
उसकी संवेदनाए जागृत है।।१।।

क्यों रोता है उसे पता नही है
वह स्वयं को जानता नही है
क्यों रोना चाहिए पता नही है
क्यों हुंआ जनम पता नही है।।२।।

मनुष्य को चाहिए कि वह सोचे
जीवन पथ है लक्ष्य नही समझे
पडाव पर रुके बिना थके बिना
वह चलता चले चलता चले।।३।।

लक्ष्य एक सुनिश्चित है
वह लक्ष्मण के अग्रज है
वह बलराम के अनुज है
हाँ, वह रामकृष्ण है।।४।।

यदि कान्हा के लिए रोओगे
रोना ही हंसना बन जाएगा।
जनम अपना सफल करोगे
कुल भी धन्य हो जाएगा।।५।।

रसखान मीरा नामदेव को
जिस क्षण तुम समझ पाओगे
तो क्या समझना शेष होगा
तुम जो चाहो वह पाओगे।।६।।

प्रयास निरन्तर करते रहो
अनायास की ओर बढते रहो
नाहं कर्ता नाहं भोक्ता 
मन्त्र को अनुभूत करते रहो।।७।।

बताओ लेकर क्या आएं थे 
बताओ क्या लेकर जाओगे 
दिखता है वह सबकुछ छोड
नही दिखता वह ले जाओगे।।८।।

देह के नाम को भूलकर
प्रभुनाम का सुमीरन करो
और कितना भटकते रहोगे
चित्त चरणों मे अर्पित करो।।९।।

जो जैसा मिलता है
वैसा बन जाते हों।
स्वयं का पता नही
मोहबीज बोते हों।।१०।।

अपने दोष से होकर शंकित
तुम किसी के अंकित बनते हों
भक्ति से ग्यान से दूर होकर
दुख की फसल उगाते हों।।११।।

मस्तिष्क पर भार ढाकर
मै गधा नही कहते हों।
जाल मे फसकर तुम
मै बन्धा नही कहते हों।।१२।।

कौन सयाना कौन है पागल
उतार दे भ्रम का गागल।
प्रभुविरहजल मे बहकर
तुम हों जाओ पवित्र मंगल।।१३।।

रोक लो प्रभु मुरत को
यदि है तुमसे संभव।
कभी कभी ही हृदय मे 
होवें प्रभु का आविर्भव।।१४।।

मत बनो अधिक सयाने
डोर प्रभु के पास है।
क्या प्रथम क्या अंतिम
प्रभु ही केवल आस है।।१५।।

बिना काम का सयानापन
काम आवे छे पगलापन
धन्य धन्य है वह जीवन
अभिन्न जिससे वृन्दावन।।१६।।
जय श्रीकृष्ण!!!

Friday, 25 November 2016

रे कान्हा.....!

©  चन्द्रहास




जो भी है वो तेरा दीया है 
तेरे जैसा दूजा नहीं है।  
तुम राधा के प्राणसखा हो 
प्रेम तिहारो रूप साचा है। 

मेरे कंठ में गीत तेरा हो 
जल में ठंडक जैसे रहे है ।
ह्रदय देस में छवि तेरी हो
अगन में रूप निहित जैसे है  ।।

माथे पर धूल चरणों की हो 
जमुना का नीर जैसे दिखे है ।
आँख में सदा संतोष मेरे हो 
बासुरी में जैसे स्वर पुनीत है ।।

युगल छवि तुम्हारी कान्हा 
मन में मति में समाहित हो ।
राधा के साख सब के राखा 
मेरा जीवन आहत ना हो ।।

इक मुठ्ठी में राजी हुए तुम 
इक पत्ते से किरपा कराई ।
ऐसे मोहन रक्षा करो जी 
जीवन रथ की करो अगुवाई ।।

यश कीर्ति दो धन सम्पदा 
भक्ति शक्ति दो, दो मधुरता ।
ना ही आवे, आवे तो भी 
टिक न पाए कोई विपदा ।।

जय श्रीकृष्ण!!!

Saturday, 29 October 2016

विस्मयित

विस्मयित
© चन्द्रहास सोनपेठकर
माझाच हासरा चेहरा पाहताना
विस्मयित होतो मी पुन्हा चालताना।।
कुणी रोविले काटे वाटेत बोचरे
कुणी दाविले बेमौसमी मोहरे।
कुणी देईले गंधाळले मोगरे
कुणी भारीले श्वास नवा घेताना।।
वंदित येऊन गंधित झालो
गर्दीत पूरता विसरून गेलो।
माझे मीपण हरवून बसलो
मुरलीधराला शरण जाताना।।
उपकार कुणाचे मानावे कळेना
मन पुन्हा मागे वळता वळेना।
दिव्यत्वाची प्रचीती पाहताना
गुणाकार सुखाचा सवें हासताना।।

सुबह होनी है।

सुबह होनी है।
© चन्द्रहास ।

सुबह हूंयी तो शाम होगी
शाम है तो सुबह होनी है।
चिन्ता तु छोड रे मनवा
शाम है तो सुबह होनी है।।

जिसने प्यारे शाम की है
सुबह वही करनेवाला है।
गैयन को चराने जाना है
सुबह वही करनेवाला है।।

काहे तु रोए आंसु बहाए
वो चाहता है तु मुस्कुराए।
जमुना का पानी युं ना बहाए
वो सबकुछ देनेवाला है।।

Sunday, 16 October 2016

My experience abt poetry

महत्त्वाचा क्षण.....!     
          कवीच्या जीवनातील सर्वात महत्त्वाचा क्षण कोणता असेल; तर त्याची अहंमन्यता संपते. एकावर एक काव्यरचना घडतात. त्या प्रवासाचे किंवा प्रवाहाचे काही टप्पे असतात.
        मी काव्य केले।
        मी किती सुन्दर काव्य केले.
        भगवतीची कृपाच की, हे काव्य मला सूचले.
        मी इतका पुण्यवान नाही की, हे काव्य मला सूचेल. नक्कीच भगवती करवून घेतेय. वही पेन संगणक ही जशी लिहीण्याची साधने आहेत, तसेच आपले शरीर मन ही देखील श्रीसरस्वतीमातेची साधनं आहेत. कर्तृत्वाभिमान विगलित होतो. आणि मग कवीला वाटतं, एक जीवन पूरणार ना? जाऊ द्या; आपण का चिंता करायची? भगवती करते बरोबर सर्वकाही. नेमका हाच क्षण महत्त्वाचा!

(हे असेच सर्वत्र लागू पडतेच असा कोणताही दावा नाही.)
        जय श्रीकृष्ण!!!

Thursday, 13 October 2016

भूकच खरी

भूकच खरी।
© चन्द्रहास

क्षणभर मलाही वाटलं,
वाटू नयेत आपट्याची पानं.
थांबवावी आपण वृक्षतोड
वाटावं सद्विचारांच सोनं.

पण भूकेल्या लहान मुलाची
आर्त किंकाळी ऐकली.
"दादा घ्या की हो सोनं"
हाक भिडली पार हृदयाशी.

"पानं नको पैसे घे" असं म्हणालो,
ते लेकरू नाही ना झालं तयार.
मग पर्यावरणवादालाच म्हणालो,
वादा, भूकेपुढे तू हारच स्वीकार

Monday, 5 September 2016

बात छोटीसी है।



 ..... बात छोटीसी है। 

- डॉ. चन्द्रहास सोनपेठकर 

किसी राजा ने एक कवी से पूछा
आप को कुछ तकलीफ तो नहीं ?
कवी ने कहा, बात छोटीसी है
पर चुभती मुझे बहोत है जी। 

राजा ने कहा हाथ बढाकर
कह दो अपनी बात कविवर। 
कवी ने कहा राजन ऐसे नहीं
पहले अभय दो शपथ लेकर।

राजा ने  अभय दिया  कवि को
कवी ने बात बताई राजा को। 
राजन, लोग आइना देखे बिना
बात हरदम किया  करते है। 

राजा ने कहा सुनो कविवर
ऐसा केवल मेरे राज्य में नहीं। 
सभी राज्यो में होता है निरंतर
आप पहले बाकियोंको बोलिये । 

कवी ने कहा राजन क्षमस्व
सभी लोगोंका है यही मंतव्य। 
सुधरें पहले मुझे छोड़कर सभी
मेरा नंबर लिस्ट में आये न कभी। 

मैं ही शायद ऐसा अनाड़ी हूं
परिवर्तन की आस लिए हूं। 
सभी भविष्य में ही सुधरेंगे
मैं वर्तमान की आस लिए हूं। 

चलता हूं अभी मैं यहाँ से
और कही नहीं जाऊंगा मैं। 
अपनीही कुटिया में से
आईना बाहर करूँगा मैं। 







 

Saturday, 13 August 2016

नमन।

नमन॥
© चन्द्रहास ।

बादलों का जमावडा अंबर मे हैं
पर वक्त पर बारीश नही होती हैं।
घोषणाएं तो लोग बहोत करते हैं
पर वक्त पर मदद नही मीलती हैं॥

योजनाएं बहोत बनती हैं सरकारी
सही दाम में नही बिकती तरकारी।
योजनाएं बहोत बनती हैं सरकारी
पर फेरे चक्कर पडते कोर्ट कचेरी॥

अपना नही सभीका पेट भर जाएं
सोचकर किसान अनाज उगाता हैं।
खुद को नही तो देश बचानेके लिए
जवान गोली मारता खाता सहता हैं॥

कवि की पीडा कवि ही जानता हैं
सच कहता हूं हाथ में भगवद्गीता हैं।
नन्हे हाथों से चिताएं सुलगती हैं
तब अगन दिल में झुलसती हैं॥

जय जवान जय किसान नारा हैं
क्यों शहीदी इन के ही नसीब हैं। नमन करे चन्द्रहास इन्हे शत कोटी
इन्हीं के समर्पण से हम जिंदा हैं ॥

........ पाहिजे.

...... पाहिजे!
© चन्द्रहास सोनपेठकर

क्षितीजाच्या पलीकडेही असते आकाश,
शोधलं पाहिजे.
नेहमीच संधी असते विकासाची, प्रत्येकाला,
शोधली पाहिजे.

एखाद्या संकटाने संपत नसतो माणूस, कधीच,
सावरलं पाहिजे.
एखाद्या वादळाने स्वप्न जात नाही हरवून,
सापडलं पाहिजे.

माणूस चुकतो, माणूसकी नाही संपत जगातली,
जपली पाहिजे.
समस्या कितीही मोठी असली, निराकृत होते,
निराकारीली पाहिजे.

मोठ्या पराभवात सुद्धा असते जिंकण्याची संधी,
दिसली पाहिजे.
लहान सहान विजयात हरण्याची असते शक्यता,
कळली पाहिजे.

देव, दानव, संत काहीही होता येतं माणसाला,
ठरवलं पाहिजे.
पण त्या आधी माणसाला माणूस म्हणून जगणं,
जमलं पाहिजे.

जय श्रीकृष्ण।।

Friday, 12 August 2016

सुदर्शन

सुदर्शन
- चन्द्रहास

भगवान श्रीकृष्ण का आयुध है सुदर्शन। है तो शस्त्र पर नाम है 'सुदर्शन'। क्यों? सुदर्शन का अर्थ है सुन्दर। सत्य ही सुंदर है। ऐसे सत्य की रक्षा करनेवाला सुदर्शन। ऐसे सुदर्शन चक्र को नमन करती कुछ पंक्तीयां......।

द्वापर से परंपरा यह
चली आ रही है सत्य।
सुदर्शन अजेय रहा है
अजेय हि रहेगा नित्य।।

सत्य की रक्षा करना
असत्य को मात देना।
यही गाथा निभाता है
सुदर्शन उसी का नाम है।।

सत्य को सुनने की
आदत अच्छी होती है।
तत्त्व जिसका हो सुन्दर
वही सुदर्शन होता है।।

जय श्रीकृष्ण।।

Thursday, 11 August 2016

मन हे....!

मन हे.....
© चंद्रहास।

कधी चकचकीत कधी चकित हे
कधी शंकित कधी आतंकित हे।
बावरे हे मन कधी अवचित हे
कधी पुलकित कधी गंधित हे॥

कधी सुजाण असलेले मन हे
कधी शून्याचे वस्त्र लेवलेले हे।
कधी कोपाचे शस्त्र धरलेले हे
कधी स्नेहाचे बंध असलेले हे॥

कधी मायेची पाखरण मन हे
कधी मोराच्या पिसा-या सम हे।
कधी एकाच मोरपीसा सम हे
कधी अस्तित्वाचे खोटे भ्रम हे॥

कधी सुरेल तराणे गाताना हे
अवखळ दिसते भ्रमरासम हे।
कधी स्वप्नात रंग भरताना हे
विसरून जाते भान आपुले हे॥

दुःखाचे डोंगर पार करताना हे
गरूडा सम जरी भासलेले हे।
कधी अटल निश्चलसे तरीही
हिमनगासम मृदु कोमलसे हे॥

कधी अथांग सागरासमान जरी
उसळत्या लाटांसह असलेले हे।
क्षणात सुस्थिर आकाशासम हे
समोर येते लेऊन वस्त्र ता-यांचे॥

शारदे जगदंबे वरदे सर्वदे।।

शारदे जगदंबे वरदे सर्वदे।।
© चन्द्रहासः।

         मां सरस्वती आप को निमित्त बना कर कोई कार्य संपन्न कराती है; तो गर्व नही। मां की कृपा को जान लों। मां जैसा दयालु, कृपालु कोई दुजा कहां? वैसे भी माई से दुजा कौन है!

निरन्तर पूजत रहूं मै देवी
मात भवानी तेरे चरणों को।
मन चातक सम नित धावे
मात भवानी तेरे चरणों को।।

शारदे जगदंबे वरदे सर्वदे
मै पामर तुम पुण्यकारिणी।
हर क्षण सावध रहूं मै माई
हंससमान हों सच्चरित मेरों।।

बासरवासिनी जय हंसवाहनी
मंगलकारिणी अमंगलनाशिनी।
वीणावादिनी जय हो तुम्हारों
कृपाकटाक्ष से हमें निहारों॥

पावन मूरत, वसन शुभ्र है
कर मे अक्षमाला विराजत है।
चरणयुगल मे विश्व समाहित
माते, तेरा सदा सदा जय हों॥

बहता नीर हों, रूक ना जावें
जीवन आगे आगे बढता जावें।
तेरी कृपा मन को सदा स्मरावें
तेरे चरणों मे चित का डेरा होंवे।।

Saturday, 6 August 2016

श्रावणसरी

श्रावणसरी...
© चन्द्रहास
श्रावणाच्या कुशीत दडलेल्या
सरींनो खुशाल बरसा तुम्ही।
किती वर्षांनी वर्षा अशी ही
सख्यानो बरसून जा मुक्त तुम्ही।।1
 
गीतनभातून चित्तस्वरांच्या
लयी होऊन बरसा तुम्ही।
चुकलेले ठेके काळजाचे
समेत लावून परता तुम्ही।।2
 
हळूवार या तुम्ही अलगद या
या स्वप्न उराशी लेऊन तुम्ही।
मृद्गंधाने गंधित दुनिया करण्या
अप्सरा स्वर्लोकातल्या तुम्ही।।3
 
एवढेच करा पण तुम्हां विनंती ही
उपकार म्हणोनि बरसा हों तुम्ही।
अपकार अपघात न व्हावा कोठेही
राधेच्या स्नेहल नजरेसम व्हा तुम्ही।।4
 
नाजूक साजूक प्रवाही तुम्ही धारा
सोबतीस तुमच्या सखा गार वारा।
चाल तुमची जणु तिरप्या हो नजरा
या केशरी कळ्यांचा माळून हो गजरा॥5
 

Shubhmitrdinam.

शुभमित्रदिनम्
अंतःकरणपूर्वक सभी मित्रों के प्रति कृतार्थता। मित्रता क्या है; यह कोई मेरे मित्रों से पुछो। शायद मै भी ठीक से ना बतां पाऊं। वह अवश्य बताएंगे। मेरे मित्रों ने मेरे लिए जो कुछ कीया, कर रहे है, वह अद्वतीय है। अतुलनीय है। वह निःस्सीम है। अमित है।
        आनंद शतवर्धित किया है। तथा समस्याएं न्यून। समस्याओं के समय, ऐसा मानो कवच बन जाते है मित्र, कि अनुभूत कीया यह केवल मित्र नही है, मां जगदंबा के अपार कृपा एवं प्रसाद का फलस्वरूप है।
        कभी लगता है, क्या यह सच है; ऐसा हों सकता है; इतना स्नेह....! रुधिर से भी श्रेष्ठ है मन का संबंध। महाकवि कालिदास कहते है, सज्जन बहोत सत्त्वरतया मित्र बन जाते है। सही है। मित्र बनकर मित्रता निभाते भी है।
        लगता है, मित्रता की व्याख्या 'मिलित्वा त्रायते' मिलकर रक्षण करते है, ऐसी ही होगी। मित्र शब्द का एक अर्थ 'सूर्य' भी है। सूर्य वह है जिस के पास कभी अंधेरा नही होता है। हर दम प्रकाश ही होता है। प्रकृति का नियम है, सूरज के अर्थात मित्र के प्रकाश से ही तो चन्द्रमा हंसता है, खिलता है।
        कितना भी लिखें,
        तो भी अपूर्ण रहें।
        मित्रता ऐसी दिव्य
        की सभी को भाएं॥
        शुभकामनाओं के साथ,
        जय श्रीकृष्ण!!!

Monday, 1 August 2016

पेड लगाओं।

पेड लगाओं।
- चन्द्रहासः।

उपर बरफ की चट्टाने
निचे लहरे सागर की।
बुंद बुंद को तरस रही
जनता बुंदेलखंड की।।

समंदर दूर तो नही
फिर भी प्यासी रही।
जनता देवगिरी और
विदर्भ तेलंगण की।।

कैसे मनाऊं मै छुटिया
देखते हुंये टूटती कुटिया।
पेड लगाओं पेड रखाओं
कसम है मां भारती की।।
© चन्द्रहास

हीरे की कथा।

हीरे की कथा।

कौन सयाना कौन है पागल
कोई नही है जानता।
हीरे को हीरा यहां पर
कोई नही है मानता॥

तराशना आता नही जिसे
वही बन बैठे है प्रमाता।
हीरे को कांच का तुकडा
कहने को लोग है आमादा॥

ऐ कांच के टुकडे,
हीरे को कितना तरसायेगा।
रो रहा हर चौराहा
उस की कहानी सुनाता॥

कांच से कोई अपना बैर
हीरा नही है कभी निभाता।
टूट जाने पर भी वह
कांच को खूबी से तराशता॥

अनमोल का मोल नही
पर वह बेमोल तो नही।
मोल चुंका नही पाते जिसका
उसे हि अनमोल कहां जाता॥

बात सिधी सी बहोत है
हर कोई यह है जानता।
अज्ञान का है बोलबाला
चूपचाप बैठी है विद्वत्ता॥

इक दिन अंधियारा जायेगा
हर तरफ बस् उजाला होगा।
कोई जोहरी साचा आयेगा
हीरे को तलाशता तराशता॥

उस दिन बोल उठेगी विद्वत्ता
न्याय करेगी प्रभुसत्ता।
हीरा सुशोभित मुकुट मे
दिखेगा मनोहर चमचमाता॥

सच एवं झूठ ।

सच एवं झूठ
@ चन्द्रहास

जो कोई सहज कह देता है
मै चाहुं जो,  वह नही मीलता है
मै लेट तो रेलगाडी राईट होती है
तो वह निश्चय हि गलत कहता है।

अपनी गलतीयां दुसरों पर थोपता है
गलत खुद होकर जमाने को कोसता है
ऐसा मनुष्य कुछ पाने का सवाल नही
पर मित्रों बहुत कुछ जरूर खोता है।

दुनीया को फसांते फसांते वह
स्वयं को ही फसांने निकलता है
भला दुसरें को फसाना ठिक नही
तो स्वयं को फसाना ठिक होगा?
नही, कदापि नही, कदापि नही।

पर क्या करे, कैसे करे दोस्तो
झुठों की झुंड और सच अकेला।
सच तो संस्कारों से निबद्ध
और झूठ विकारों का घौसला।

सच का विजय तो निश्चित होता है
पर इस लिये नही केवल, की सच है
संघर्ष नही, सबर नही, तो जीत नही
संघर्ष है समर्पण है तो ही विजय है।

डरना भी नही झुकना भी नही
टूटना भी नही है तो क्या करें।
स्वयं को आत्मा मान कर चले
देह मान कर बहुत सह लिए।।

Friday, 22 July 2016

आज आवाज उठानेवाले है।

आज आवाज उठानेवाले है।
                                    डा. चन्द्रहास शास्त्री

 

"भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारी पूर्वजों को भारतरत्न  मिलना चाहिए ।"

 
मां भारती के श्रीचरणों मे
अर्पित किया जीवन जिन्होने।
उन को भारतरत्न  क्यों नही
उन को भारतरत्न क्यों नही।।
 
सावरकर आजाद बोस  को
बोलो भारतरत्न क्यों नही।
भगतसिंग राजगुरु सुखदेव को
बोलो भारतरत्न क्यों नही।।
 
अब नही चूप बैठेंगे हम
आज आवाज उठानेवाले है।
भारतमाताके वीरसपूतोंको
गौरव मिलें, आवाहन है।।
 
आजादी हमे मिली है बंधो,
सभी के प्रयासों से, रखें याद।
जन जन दिखे प्रतिबद्ध हमें
क्रांतिकारीओंके प्रति आज।।
 
अभी नही तो कब होगा बताओ
दिन साल नही सातदशक बितायों।
फिर भी वंचित क्यों है अमर, बलिदानी,
त्यागी, तपस्वी, भारतरत्न से बताओ।।
 
लोकमान्य तिलक एवं चन्द्रशेखर आझाद जयंती के उपलक्ष्य मे विनम्र अभिवादन के साथ.......।

- - - - - होती है।

- - - - - होती है।

हर बर्फ़ मे अगन होती है
हर ठंड मे जलन होती है।
हर फूल मे चुभन होती है
हर आँख मे कुडन होती हैं॥१

हर नज़र में हया होती है
हर जिगर मे दया होती है।
हर मौसम मे रया होती है
किसी से गुस्ताखियां होती है॥२

हर मुद्दद मे ताकद होती है
हर बात मे कहावत होती है।
हर कहानी मे आफत होती है
हर आफत मे जिद होती है॥३

उँगलियाँ दस होती है
अँगूठीयां भी दस होती है।
अँगूठी की तलाश होती है
पर हीरे की तराश होती है॥४

आँखों मे इक नमी होती हैं
दिल में बात दबी होती है।
हर इंसा में खूबी होती है
कहीं कुछ तो कमी होती है॥५

शायरकी भी अर्जी होती है
शायरी नहीं फर्जी होती है।
दुनिया भी सजीं होती है
बस् आपकी मर्जी होती है॥६

दिन से पहले रात होती है
रात के बाद प्रभात होती है।
आफताब से मुलाकात होती है
इक अनकहीसीं बात होती है।।७

चाँद की छवि कुछ तो
ऐसी मीठी सी होती है।
कि उसके हँसी की
दुनिया कायल होती है॥८

© चन्द्रहास:।

जिधर भी देखो तुम हो प्यारे।

जिधर भी देखो तुम हो प्यारे।

डॉ. चन्द्रहास शास्त्री 


कण कण में समाहित तुम हो प्यारे।

जिधर भी देखो तुम हो प्यारे।।

 

युगल तुम्हारी छवि मन को भाये।

जो भी देखे सुध अपनी खो जाये।।

 

हाथ में बंसी माथे पर पंखुड़ी होये। 

बिरहगां में तुम्हारे भक्त जन रोये।।

 

रोनेवाले सच में सयाने वो होये। 

न रोनेवाले तो फेरे में अटके जाये।।

 

मीरा सयानी सयानी राधारानी गाए। 

हम मूरख से बात क्या कहलाये।।

 

चन्द्रहास कर प्रणाम विनती कराये। 

मोहन, जाना है तो तुम ना ही आये।।

 

पर मुख से थारो नित नाम गवाएं। 

नाम तुम्हारो कभी ना भुलाये।। 

जय श्रीकृष्ण। 

 

Wednesday, 20 July 2016

--------------तरच, प्रशासक व्हायचं!

--------------तरच, प्रशासक व्हायचं!
 डॉ. चंद्रहास सोनपेठकर

कितीही आलं मनात राग
तरी त्याची आग होऊ देता येत नाही.

आपण कितीही हुशार असलो
तरी तसे म्हणण्याची मुभाच नाही.

सारेच सहकारी हुशार म्हणायचे
या समजूतदारीला कशी तोडच नाही.

बसण्याची खुर्ची दिसते हो सर्वाना
कामाचं टेबल पाहायला कुणाला वेळच नाही.

आपल्याला सर्वांचे सहकार्य हवे ना
कुणाला काही बोलण्याची बिषादचं नाही.

रोज रोज नवी ऊर्जा आणायची
काम पुढे रेटायचं थकायला वेळच नाही.

घेतलीये ना जबाबदारी बस आता
माघार घ्यायला दोरच शिल्लक नाही.

पुढेच जायचं, पुढेच न्यायचं तरच,
प्रशासक व्हायचं, थांबायचा प्रश्नच नाही.

जय श्रीकृष्ण!!!

हम लक्ष्य पाएंगे !

हम लक्ष्य पाएंगे !

 डॉ. चन्द्रहास शास्त्री

 

घना हो कितना भी अँधियारा

हम उजाले की ओर निरन्तर बढ़ेंगे।

कोई दौड़ता भागता और थकता

हम अविरत कर्म कर लक्ष्य पाएंगे।। १ ।।

 

 पांचजन्य की ध्वनि सुनकर हम

यत्नरथ को बढ़ाएंगे लक्ष्य की ओर। 

गतिरोधक हो कितने भी मार्ग में

दिशाएं आशीष देंगी चारो ओर।।२ ।।

  

मन की विशुद्धता से अभिभूत हो कर

चित्त की एकाग्रता से ओतप्रोत हो कर। 

प्रचण्ड प्रगल्भ इच्छाशक्ति से संपन्न

हम लक्ष्य को सहज सुलभ पाएंगे।।३ ।।

 जय श्रीकृष्ण!!! 

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...