Saturday, 13 August 2016

नमन।

नमन॥
© चन्द्रहास ।

बादलों का जमावडा अंबर मे हैं
पर वक्त पर बारीश नही होती हैं।
घोषणाएं तो लोग बहोत करते हैं
पर वक्त पर मदद नही मीलती हैं॥

योजनाएं बहोत बनती हैं सरकारी
सही दाम में नही बिकती तरकारी।
योजनाएं बहोत बनती हैं सरकारी
पर फेरे चक्कर पडते कोर्ट कचेरी॥

अपना नही सभीका पेट भर जाएं
सोचकर किसान अनाज उगाता हैं।
खुद को नही तो देश बचानेके लिए
जवान गोली मारता खाता सहता हैं॥

कवि की पीडा कवि ही जानता हैं
सच कहता हूं हाथ में भगवद्गीता हैं।
नन्हे हाथों से चिताएं सुलगती हैं
तब अगन दिल में झुलसती हैं॥

जय जवान जय किसान नारा हैं
क्यों शहीदी इन के ही नसीब हैं। नमन करे चन्द्रहास इन्हे शत कोटी
इन्हीं के समर्पण से हम जिंदा हैं ॥

........ पाहिजे.

...... पाहिजे!
© चन्द्रहास सोनपेठकर

क्षितीजाच्या पलीकडेही असते आकाश,
शोधलं पाहिजे.
नेहमीच संधी असते विकासाची, प्रत्येकाला,
शोधली पाहिजे.

एखाद्या संकटाने संपत नसतो माणूस, कधीच,
सावरलं पाहिजे.
एखाद्या वादळाने स्वप्न जात नाही हरवून,
सापडलं पाहिजे.

माणूस चुकतो, माणूसकी नाही संपत जगातली,
जपली पाहिजे.
समस्या कितीही मोठी असली, निराकृत होते,
निराकारीली पाहिजे.

मोठ्या पराभवात सुद्धा असते जिंकण्याची संधी,
दिसली पाहिजे.
लहान सहान विजयात हरण्याची असते शक्यता,
कळली पाहिजे.

देव, दानव, संत काहीही होता येतं माणसाला,
ठरवलं पाहिजे.
पण त्या आधी माणसाला माणूस म्हणून जगणं,
जमलं पाहिजे.

जय श्रीकृष्ण।।

Friday, 12 August 2016

सुदर्शन

सुदर्शन
- चन्द्रहास

भगवान श्रीकृष्ण का आयुध है सुदर्शन। है तो शस्त्र पर नाम है 'सुदर्शन'। क्यों? सुदर्शन का अर्थ है सुन्दर। सत्य ही सुंदर है। ऐसे सत्य की रक्षा करनेवाला सुदर्शन। ऐसे सुदर्शन चक्र को नमन करती कुछ पंक्तीयां......।

द्वापर से परंपरा यह
चली आ रही है सत्य।
सुदर्शन अजेय रहा है
अजेय हि रहेगा नित्य।।

सत्य की रक्षा करना
असत्य को मात देना।
यही गाथा निभाता है
सुदर्शन उसी का नाम है।।

सत्य को सुनने की
आदत अच्छी होती है।
तत्त्व जिसका हो सुन्दर
वही सुदर्शन होता है।।

जय श्रीकृष्ण।।

Thursday, 11 August 2016

मन हे....!

मन हे.....
© चंद्रहास।

कधी चकचकीत कधी चकित हे
कधी शंकित कधी आतंकित हे।
बावरे हे मन कधी अवचित हे
कधी पुलकित कधी गंधित हे॥

कधी सुजाण असलेले मन हे
कधी शून्याचे वस्त्र लेवलेले हे।
कधी कोपाचे शस्त्र धरलेले हे
कधी स्नेहाचे बंध असलेले हे॥

कधी मायेची पाखरण मन हे
कधी मोराच्या पिसा-या सम हे।
कधी एकाच मोरपीसा सम हे
कधी अस्तित्वाचे खोटे भ्रम हे॥

कधी सुरेल तराणे गाताना हे
अवखळ दिसते भ्रमरासम हे।
कधी स्वप्नात रंग भरताना हे
विसरून जाते भान आपुले हे॥

दुःखाचे डोंगर पार करताना हे
गरूडा सम जरी भासलेले हे।
कधी अटल निश्चलसे तरीही
हिमनगासम मृदु कोमलसे हे॥

कधी अथांग सागरासमान जरी
उसळत्या लाटांसह असलेले हे।
क्षणात सुस्थिर आकाशासम हे
समोर येते लेऊन वस्त्र ता-यांचे॥

शारदे जगदंबे वरदे सर्वदे।।

शारदे जगदंबे वरदे सर्वदे।।
© चन्द्रहासः।

         मां सरस्वती आप को निमित्त बना कर कोई कार्य संपन्न कराती है; तो गर्व नही। मां की कृपा को जान लों। मां जैसा दयालु, कृपालु कोई दुजा कहां? वैसे भी माई से दुजा कौन है!

निरन्तर पूजत रहूं मै देवी
मात भवानी तेरे चरणों को।
मन चातक सम नित धावे
मात भवानी तेरे चरणों को।।

शारदे जगदंबे वरदे सर्वदे
मै पामर तुम पुण्यकारिणी।
हर क्षण सावध रहूं मै माई
हंससमान हों सच्चरित मेरों।।

बासरवासिनी जय हंसवाहनी
मंगलकारिणी अमंगलनाशिनी।
वीणावादिनी जय हो तुम्हारों
कृपाकटाक्ष से हमें निहारों॥

पावन मूरत, वसन शुभ्र है
कर मे अक्षमाला विराजत है।
चरणयुगल मे विश्व समाहित
माते, तेरा सदा सदा जय हों॥

बहता नीर हों, रूक ना जावें
जीवन आगे आगे बढता जावें।
तेरी कृपा मन को सदा स्मरावें
तेरे चरणों मे चित का डेरा होंवे।।

Saturday, 6 August 2016

श्रावणसरी

श्रावणसरी...
© चन्द्रहास
श्रावणाच्या कुशीत दडलेल्या
सरींनो खुशाल बरसा तुम्ही।
किती वर्षांनी वर्षा अशी ही
सख्यानो बरसून जा मुक्त तुम्ही।।1
 
गीतनभातून चित्तस्वरांच्या
लयी होऊन बरसा तुम्ही।
चुकलेले ठेके काळजाचे
समेत लावून परता तुम्ही।।2
 
हळूवार या तुम्ही अलगद या
या स्वप्न उराशी लेऊन तुम्ही।
मृद्गंधाने गंधित दुनिया करण्या
अप्सरा स्वर्लोकातल्या तुम्ही।।3
 
एवढेच करा पण तुम्हां विनंती ही
उपकार म्हणोनि बरसा हों तुम्ही।
अपकार अपघात न व्हावा कोठेही
राधेच्या स्नेहल नजरेसम व्हा तुम्ही।।4
 
नाजूक साजूक प्रवाही तुम्ही धारा
सोबतीस तुमच्या सखा गार वारा।
चाल तुमची जणु तिरप्या हो नजरा
या केशरी कळ्यांचा माळून हो गजरा॥5
 

Shubhmitrdinam.

शुभमित्रदिनम्
अंतःकरणपूर्वक सभी मित्रों के प्रति कृतार्थता। मित्रता क्या है; यह कोई मेरे मित्रों से पुछो। शायद मै भी ठीक से ना बतां पाऊं। वह अवश्य बताएंगे। मेरे मित्रों ने मेरे लिए जो कुछ कीया, कर रहे है, वह अद्वतीय है। अतुलनीय है। वह निःस्सीम है। अमित है।
        आनंद शतवर्धित किया है। तथा समस्याएं न्यून। समस्याओं के समय, ऐसा मानो कवच बन जाते है मित्र, कि अनुभूत कीया यह केवल मित्र नही है, मां जगदंबा के अपार कृपा एवं प्रसाद का फलस्वरूप है।
        कभी लगता है, क्या यह सच है; ऐसा हों सकता है; इतना स्नेह....! रुधिर से भी श्रेष्ठ है मन का संबंध। महाकवि कालिदास कहते है, सज्जन बहोत सत्त्वरतया मित्र बन जाते है। सही है। मित्र बनकर मित्रता निभाते भी है।
        लगता है, मित्रता की व्याख्या 'मिलित्वा त्रायते' मिलकर रक्षण करते है, ऐसी ही होगी। मित्र शब्द का एक अर्थ 'सूर्य' भी है। सूर्य वह है जिस के पास कभी अंधेरा नही होता है। हर दम प्रकाश ही होता है। प्रकृति का नियम है, सूरज के अर्थात मित्र के प्रकाश से ही तो चन्द्रमा हंसता है, खिलता है।
        कितना भी लिखें,
        तो भी अपूर्ण रहें।
        मित्रता ऐसी दिव्य
        की सभी को भाएं॥
        शुभकामनाओं के साथ,
        जय श्रीकृष्ण!!!

Monday, 1 August 2016

पेड लगाओं।

पेड लगाओं।
- चन्द्रहासः।

उपर बरफ की चट्टाने
निचे लहरे सागर की।
बुंद बुंद को तरस रही
जनता बुंदेलखंड की।।

समंदर दूर तो नही
फिर भी प्यासी रही।
जनता देवगिरी और
विदर्भ तेलंगण की।।

कैसे मनाऊं मै छुटिया
देखते हुंये टूटती कुटिया।
पेड लगाओं पेड रखाओं
कसम है मां भारती की।।
© चन्द्रहास

हीरे की कथा।

हीरे की कथा।

कौन सयाना कौन है पागल
कोई नही है जानता।
हीरे को हीरा यहां पर
कोई नही है मानता॥

तराशना आता नही जिसे
वही बन बैठे है प्रमाता।
हीरे को कांच का तुकडा
कहने को लोग है आमादा॥

ऐ कांच के टुकडे,
हीरे को कितना तरसायेगा।
रो रहा हर चौराहा
उस की कहानी सुनाता॥

कांच से कोई अपना बैर
हीरा नही है कभी निभाता।
टूट जाने पर भी वह
कांच को खूबी से तराशता॥

अनमोल का मोल नही
पर वह बेमोल तो नही।
मोल चुंका नही पाते जिसका
उसे हि अनमोल कहां जाता॥

बात सिधी सी बहोत है
हर कोई यह है जानता।
अज्ञान का है बोलबाला
चूपचाप बैठी है विद्वत्ता॥

इक दिन अंधियारा जायेगा
हर तरफ बस् उजाला होगा।
कोई जोहरी साचा आयेगा
हीरे को तलाशता तराशता॥

उस दिन बोल उठेगी विद्वत्ता
न्याय करेगी प्रभुसत्ता।
हीरा सुशोभित मुकुट मे
दिखेगा मनोहर चमचमाता॥

सच एवं झूठ ।

सच एवं झूठ
@ चन्द्रहास

जो कोई सहज कह देता है
मै चाहुं जो,  वह नही मीलता है
मै लेट तो रेलगाडी राईट होती है
तो वह निश्चय हि गलत कहता है।

अपनी गलतीयां दुसरों पर थोपता है
गलत खुद होकर जमाने को कोसता है
ऐसा मनुष्य कुछ पाने का सवाल नही
पर मित्रों बहुत कुछ जरूर खोता है।

दुनीया को फसांते फसांते वह
स्वयं को ही फसांने निकलता है
भला दुसरें को फसाना ठिक नही
तो स्वयं को फसाना ठिक होगा?
नही, कदापि नही, कदापि नही।

पर क्या करे, कैसे करे दोस्तो
झुठों की झुंड और सच अकेला।
सच तो संस्कारों से निबद्ध
और झूठ विकारों का घौसला।

सच का विजय तो निश्चित होता है
पर इस लिये नही केवल, की सच है
संघर्ष नही, सबर नही, तो जीत नही
संघर्ष है समर्पण है तो ही विजय है।

डरना भी नही झुकना भी नही
टूटना भी नही है तो क्या करें।
स्वयं को आत्मा मान कर चले
देह मान कर बहुत सह लिए।।

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...