Monday, 1 August 2016

सच एवं झूठ ।

सच एवं झूठ
@ चन्द्रहास

जो कोई सहज कह देता है
मै चाहुं जो,  वह नही मीलता है
मै लेट तो रेलगाडी राईट होती है
तो वह निश्चय हि गलत कहता है।

अपनी गलतीयां दुसरों पर थोपता है
गलत खुद होकर जमाने को कोसता है
ऐसा मनुष्य कुछ पाने का सवाल नही
पर मित्रों बहुत कुछ जरूर खोता है।

दुनीया को फसांते फसांते वह
स्वयं को ही फसांने निकलता है
भला दुसरें को फसाना ठिक नही
तो स्वयं को फसाना ठिक होगा?
नही, कदापि नही, कदापि नही।

पर क्या करे, कैसे करे दोस्तो
झुठों की झुंड और सच अकेला।
सच तो संस्कारों से निबद्ध
और झूठ विकारों का घौसला।

सच का विजय तो निश्चित होता है
पर इस लिये नही केवल, की सच है
संघर्ष नही, सबर नही, तो जीत नही
संघर्ष है समर्पण है तो ही विजय है।

डरना भी नही झुकना भी नही
टूटना भी नही है तो क्या करें।
स्वयं को आत्मा मान कर चले
देह मान कर बहुत सह लिए।।

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