Friday, 25 November 2016

रे कान्हा.....!

©  चन्द्रहास




जो भी है वो तेरा दीया है 
तेरे जैसा दूजा नहीं है।  
तुम राधा के प्राणसखा हो 
प्रेम तिहारो रूप साचा है। 

मेरे कंठ में गीत तेरा हो 
जल में ठंडक जैसे रहे है ।
ह्रदय देस में छवि तेरी हो
अगन में रूप निहित जैसे है  ।।

माथे पर धूल चरणों की हो 
जमुना का नीर जैसे दिखे है ।
आँख में सदा संतोष मेरे हो 
बासुरी में जैसे स्वर पुनीत है ।।

युगल छवि तुम्हारी कान्हा 
मन में मति में समाहित हो ।
राधा के साख सब के राखा 
मेरा जीवन आहत ना हो ।।

इक मुठ्ठी में राजी हुए तुम 
इक पत्ते से किरपा कराई ।
ऐसे मोहन रक्षा करो जी 
जीवन रथ की करो अगुवाई ।।

यश कीर्ति दो धन सम्पदा 
भक्ति शक्ति दो, दो मधुरता ।
ना ही आवे, आवे तो भी 
टिक न पाए कोई विपदा ।।

जय श्रीकृष्ण!!!

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...