Friday, 22 July 2016

आज आवाज उठानेवाले है।

आज आवाज उठानेवाले है।
                                    डा. चन्द्रहास शास्त्री

 

"भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारी पूर्वजों को भारतरत्न  मिलना चाहिए ।"

 
मां भारती के श्रीचरणों मे
अर्पित किया जीवन जिन्होने।
उन को भारतरत्न  क्यों नही
उन को भारतरत्न क्यों नही।।
 
सावरकर आजाद बोस  को
बोलो भारतरत्न क्यों नही।
भगतसिंग राजगुरु सुखदेव को
बोलो भारतरत्न क्यों नही।।
 
अब नही चूप बैठेंगे हम
आज आवाज उठानेवाले है।
भारतमाताके वीरसपूतोंको
गौरव मिलें, आवाहन है।।
 
आजादी हमे मिली है बंधो,
सभी के प्रयासों से, रखें याद।
जन जन दिखे प्रतिबद्ध हमें
क्रांतिकारीओंके प्रति आज।।
 
अभी नही तो कब होगा बताओ
दिन साल नही सातदशक बितायों।
फिर भी वंचित क्यों है अमर, बलिदानी,
त्यागी, तपस्वी, भारतरत्न से बताओ।।
 
लोकमान्य तिलक एवं चन्द्रशेखर आझाद जयंती के उपलक्ष्य मे विनम्र अभिवादन के साथ.......।

- - - - - होती है।

- - - - - होती है।

हर बर्फ़ मे अगन होती है
हर ठंड मे जलन होती है।
हर फूल मे चुभन होती है
हर आँख मे कुडन होती हैं॥१

हर नज़र में हया होती है
हर जिगर मे दया होती है।
हर मौसम मे रया होती है
किसी से गुस्ताखियां होती है॥२

हर मुद्दद मे ताकद होती है
हर बात मे कहावत होती है।
हर कहानी मे आफत होती है
हर आफत मे जिद होती है॥३

उँगलियाँ दस होती है
अँगूठीयां भी दस होती है।
अँगूठी की तलाश होती है
पर हीरे की तराश होती है॥४

आँखों मे इक नमी होती हैं
दिल में बात दबी होती है।
हर इंसा में खूबी होती है
कहीं कुछ तो कमी होती है॥५

शायरकी भी अर्जी होती है
शायरी नहीं फर्जी होती है।
दुनिया भी सजीं होती है
बस् आपकी मर्जी होती है॥६

दिन से पहले रात होती है
रात के बाद प्रभात होती है।
आफताब से मुलाकात होती है
इक अनकहीसीं बात होती है।।७

चाँद की छवि कुछ तो
ऐसी मीठी सी होती है।
कि उसके हँसी की
दुनिया कायल होती है॥८

© चन्द्रहास:।

जिधर भी देखो तुम हो प्यारे।

जिधर भी देखो तुम हो प्यारे।

डॉ. चन्द्रहास शास्त्री 


कण कण में समाहित तुम हो प्यारे।

जिधर भी देखो तुम हो प्यारे।।

 

युगल तुम्हारी छवि मन को भाये।

जो भी देखे सुध अपनी खो जाये।।

 

हाथ में बंसी माथे पर पंखुड़ी होये। 

बिरहगां में तुम्हारे भक्त जन रोये।।

 

रोनेवाले सच में सयाने वो होये। 

न रोनेवाले तो फेरे में अटके जाये।।

 

मीरा सयानी सयानी राधारानी गाए। 

हम मूरख से बात क्या कहलाये।।

 

चन्द्रहास कर प्रणाम विनती कराये। 

मोहन, जाना है तो तुम ना ही आये।।

 

पर मुख से थारो नित नाम गवाएं। 

नाम तुम्हारो कभी ना भुलाये।। 

जय श्रीकृष्ण। 

 

Wednesday, 20 July 2016

--------------तरच, प्रशासक व्हायचं!

--------------तरच, प्रशासक व्हायचं!
 डॉ. चंद्रहास सोनपेठकर

कितीही आलं मनात राग
तरी त्याची आग होऊ देता येत नाही.

आपण कितीही हुशार असलो
तरी तसे म्हणण्याची मुभाच नाही.

सारेच सहकारी हुशार म्हणायचे
या समजूतदारीला कशी तोडच नाही.

बसण्याची खुर्ची दिसते हो सर्वाना
कामाचं टेबल पाहायला कुणाला वेळच नाही.

आपल्याला सर्वांचे सहकार्य हवे ना
कुणाला काही बोलण्याची बिषादचं नाही.

रोज रोज नवी ऊर्जा आणायची
काम पुढे रेटायचं थकायला वेळच नाही.

घेतलीये ना जबाबदारी बस आता
माघार घ्यायला दोरच शिल्लक नाही.

पुढेच जायचं, पुढेच न्यायचं तरच,
प्रशासक व्हायचं, थांबायचा प्रश्नच नाही.

जय श्रीकृष्ण!!!

हम लक्ष्य पाएंगे !

हम लक्ष्य पाएंगे !

 डॉ. चन्द्रहास शास्त्री

 

घना हो कितना भी अँधियारा

हम उजाले की ओर निरन्तर बढ़ेंगे।

कोई दौड़ता भागता और थकता

हम अविरत कर्म कर लक्ष्य पाएंगे।। १ ।।

 

 पांचजन्य की ध्वनि सुनकर हम

यत्नरथ को बढ़ाएंगे लक्ष्य की ओर। 

गतिरोधक हो कितने भी मार्ग में

दिशाएं आशीष देंगी चारो ओर।।२ ।।

  

मन की विशुद्धता से अभिभूत हो कर

चित्त की एकाग्रता से ओतप्रोत हो कर। 

प्रचण्ड प्रगल्भ इच्छाशक्ति से संपन्न

हम लक्ष्य को सहज सुलभ पाएंगे।।३ ।।

 जय श्रीकृष्ण!!! 

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...