Friday, 16 December 2016

 अभिन्न जिससे वृन्दावन।।

© चन्द्रहासः।

मनुष्य रोता है अच्छी बात है
रोने से ही तो पता चलता है
कि मन अभी जीवित है
उसकी संवेदनाए जागृत है।।१।।

क्यों रोता है उसे पता नही है
वह स्वयं को जानता नही है
क्यों रोना चाहिए पता नही है
क्यों हुंआ जनम पता नही है।।२।।

मनुष्य को चाहिए कि वह सोचे
जीवन पथ है लक्ष्य नही समझे
पडाव पर रुके बिना थके बिना
वह चलता चले चलता चले।।३।।

लक्ष्य एक सुनिश्चित है
वह लक्ष्मण के अग्रज है
वह बलराम के अनुज है
हाँ, वह रामकृष्ण है।।४।।

यदि कान्हा के लिए रोओगे
रोना ही हंसना बन जाएगा।
जनम अपना सफल करोगे
कुल भी धन्य हो जाएगा।।५।।

रसखान मीरा नामदेव को
जिस क्षण तुम समझ पाओगे
तो क्या समझना शेष होगा
तुम जो चाहो वह पाओगे।।६।।

प्रयास निरन्तर करते रहो
अनायास की ओर बढते रहो
नाहं कर्ता नाहं भोक्ता 
मन्त्र को अनुभूत करते रहो।।७।।

बताओ लेकर क्या आएं थे 
बताओ क्या लेकर जाओगे 
दिखता है वह सबकुछ छोड
नही दिखता वह ले जाओगे।।८।।

देह के नाम को भूलकर
प्रभुनाम का सुमीरन करो
और कितना भटकते रहोगे
चित्त चरणों मे अर्पित करो।।९।।

जो जैसा मिलता है
वैसा बन जाते हों।
स्वयं का पता नही
मोहबीज बोते हों।।१०।।

अपने दोष से होकर शंकित
तुम किसी के अंकित बनते हों
भक्ति से ग्यान से दूर होकर
दुख की फसल उगाते हों।।११।।

मस्तिष्क पर भार ढाकर
मै गधा नही कहते हों।
जाल मे फसकर तुम
मै बन्धा नही कहते हों।।१२।।

कौन सयाना कौन है पागल
उतार दे भ्रम का गागल।
प्रभुविरहजल मे बहकर
तुम हों जाओ पवित्र मंगल।।१३।।

रोक लो प्रभु मुरत को
यदि है तुमसे संभव।
कभी कभी ही हृदय मे 
होवें प्रभु का आविर्भव।।१४।।

मत बनो अधिक सयाने
डोर प्रभु के पास है।
क्या प्रथम क्या अंतिम
प्रभु ही केवल आस है।।१५।।

बिना काम का सयानापन
काम आवे छे पगलापन
धन्य धन्य है वह जीवन
अभिन्न जिससे वृन्दावन।।१६।।
जय श्रीकृष्ण!!!

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