Saturday, 2 December 2017

पग भूमी पर, ऐसे व्योम बनो।

पग भूमी पर, ऐसे व्योम बनो।
© चन्द्रहास शास्त्री

निर्लज्ज नही, निर्मम नही
निरालस बनो सदा।
निर्जन नही, निर्दय नही
निरागस बनो सदा।।

स्वार्थ नही; सीमित स्वार्थ पाप है।
बहती नदी बनो, ठहरा जल नही।।
विस्तीर्ण हृदय हो जिसका सहज
चट्टान भी लांघता है  वही ।।

आंधी नही, तुफान नही
इक प्यारासा पवन बनो।
सैलाब नही, अकाल नही
इक प्यारासा पर्जन्य बनो।।

किस शाक पर कौन पंछी बैठा है
मित्रो, निश्चित कोई नही जानता है ।
अंतर से उस का मनोहर ध्वनि सुनो
भाषा नही पर भाव समझ आता है।।

अहंकार नही, हुंकार बनो
पाञ्चजन्य के समान बनो।
उत्कर्ष के नये आयाम बनो
पग भूमी पर, ऐसे व्योम बनो।।

निरन्तर रुके बिना थके बिना,
ध्येयपथ पर सदा चलते रहो।
जगद्गुरु है परमात्मा कल्याणकारी
उन पर अटल भरौसा करते रहो।।

जय श्रीकृष्ण!
चन्द्रहासः।

Saturday, 21 October 2017

परतीचा पाऊस

परतीचा पाऊस
© चन्द्रहास।

कुठेही गेलो आपण जगात;
मन आपलं तिथेच असतं.
याचं खरं कारण सांगू?
आपलं विश्व तिथेच असतं.

परतीचा पाऊस, अंधारलेला दिवस
कासावीस होतो तेव्हा जीव
कारण मनानं कधीच; होय, कधीच
ओलांडलेली नसते ती शीव

ना विसरता येतं ते डबा खाणं
कट्ट्यावरचं आपलं चहा पिणं
दाट धुक्यात सूचलेली ती कवणं
अन एकमेकांना हास हास हसवणं

NSB मधील सर्व Friendsना समर्पित...

Sunday, 3 September 2017

जय श्रीकृष्ण कहने लगा

जय श्रीकृष्ण कहने लगा
चन्द्रहास शास्त्री

इक समय ऐसा था कि
कौरवों का जमावडा था
कुछ कौरव नही थे
पर उनके हितैषी थे

मेरे कृष्णलला मुझे कहते
न सारे कौरव है,
न सारे उनके हितैषी है
तुम जो जैसा हों
संजोये रखो

मै तुम्हारे साथ हूं
तो अंतिम विजय तुम्हारी है
सत्पथ पर चलते रहो
कहीं क्षमा कहीं दुर्लक्ष करो

तो मैने कृष्णलला से कुछ मांग लिया
दिग्विजय की उस बेला मे
बस तुम्हारी अनुकम्पा का स्मरण रहे
जयकारे आप ही के लगे ठाकुर जी
बन्दा कुछ नही, उसे रब ने बचा लिया
लोग उस समय इतना ही कहते रहे

ठाकुर जी तब मंद मंद मुस्कुराने लगे
घुंघराले बाल उनकी शोभा बढाने लगे
मै नयनबाष्प से उनके चरण धोने लगा
जय श्रीकृष्ण कहने लगा, कहने लगा

होता हूं कभी स्तुतिमाला से शोभित
स्मरण करता हूं ठाकुर जी को
हृदय कमल मे देख उनको विराजित
अहंकार निश्चित ही होता है पराजित

Sunday, 23 July 2017

वाढते शत्रुत्व जागी तयाचे

वाढते शत्रुत्व जागी तयाचे
⇙ चन्द्रहास सोनपेठकर

मूर्ख नसल्याचे कळते ज्याने,
तितुकेच शहाणपण जगां पूरे l
अधिक ते दिसता शहाणपण
वाढते शत्रुत्व जागी तयाचे ll


दीन नाही कळते ज्याने
तितुकेच धन जगां पूरे l
अधिक ते दिसता धनिकपण
वाढते शत्रुत्व जागी तयाचे ll

जसे असावे तसे माणसाने दिसावे
जितके असावे तितके न दिसावे l
तसे तितके दिसता तरी
वाढते शत्रुत्व जागी तयाचे ll

सुखासी खरे पात्र होई

सुखासी खरे पात्र होई
⇙ चन्द्रहास सोनपेठकर


कुणाचाच कावा कधीही मनाला
कळूनी न यावा बरे माणसाला l
मनी शुद्धता ती रहावी सदा ही
मुखी तेच यावे मनी जे असावे ll

वरी बैसलासे तयां काम काही
असू दे उरू दे करण्यास दंड l
तयां जाण साची असे निश्चिता ही
उगा का करीशी मना तूच बंड ll

तयाच्या स्वभावा स्मरुनी मनात
न चिंता करावी कधीही कशाची l
तयाच्याच पायी नमस्कार साचा
करूनी सुखासी खरे पात्र होई ll

Sunday, 2 July 2017

करीतसे प्रभात श्रीहरी।।

 करीतसे प्रभात श्रीहरी।।

डॉ चन्द्रहास सोनपेठकर

 किती खरे बोलशील मना ।
जगी कसे राहशील मना।।1।।

कागदी फुलांत गंध शोधती।
बेगडी सुरात बोल बोलती।।2।।

सलाम ठोकती खुशाल रे।
मनात पेटती मशाल रे।।3।।

तुला कधी जमायचे मना।
असे लटीक वागणे पुन्हा।।4।।

रहा खराच या जगात रे।
पहा खुशाल सावधान रे।।5।।

करू नकोस काळजी तरी।
करीतसे प्रभात श्रीहरी।।6।।

मला दाखवी बा तुझे रूप गोड़ ॥

 मला दाखवी बा तुझे रूप गोड ॥

डॉ चन्द्रहास सोनपेठकर

 (भुजङ्गप्रयात)
प्रतीक्षा करावी किती रे तुझी मी
हरी विठ्ठला रुक्मिणीच्या वरा रे।
दिला तू मला जन्म भक्ताकुळी रे
पहावी विठोबा किती वाट मी रे।।1॥

जरी माळ कंठी मला घातलीसे
तसे वारक-याकुळी पावलोसे।
तुझी वाट जन्मी सदा पाहतो रे
मनी आस ही दर्शनाची असे रे।।2॥

मला घेतलेसी समीपे परी रे
अजूनी न केलीस आशा खरी रे।
असे विन्मुखी दर्शनासी कसा मी
जप ध्यान तत्त्वैक मानी तुला रे।।3॥

असे चन्द्रहासा मनी एक आस
तुला सांगतो मी तसे जे उरात।
मला दाखवी बा तुझे रूप गोड 
दिसावेस सर्वत्र राया जगात॥4॥

अन जग वैकुंठ दिसावे।।

 अन जग वैकुंठ दिसावे।।

डॉ चन्द्रहास सोनपेठकर 

 
देवा तुझिया शरण म्या यावे
शांत निवांत भाव असावे।
चरणकमली फूले सुगंधी
त्या गंधात म्या विरूनी जावे।।

नकोच उरणे अन माघारी फिरणे
तुला बघून सारे मोह सुटावे।
नकोच पुन्हा लटके लटकणे
तुला पाहून कैवल्य स्मरावे।।

काय इथे आणिक काय तिथे
हृदयी तू राहण्यास यावे।
तुझेच सगुण रूप ते हे हे ते
अन जग वैकुंठ दिसावे।।

चालावे हळु परी---!

 चालावे हळु परी---!

डॉ चन्द्रहास सोनपेठकर


चालावे हळु परी
कोणास दुखवू नये।
बोलूनी खोटे पुन्हा
कोणास सुखवू नये॥

कौशल्य अंगी असता
गर्वाने वागू नये।
लटकी करी प्रशंसा
लबाडास जोडू नये॥

खलासी कधीही कोठेही
शरण जाऊ नये।
भक्ती नारायणाची कदा
माणसाने सोडू नये॥

नमस्कार माझा तुला रेणुकेला।।

नमस्कार माझा तुला रेणुकेला।।

(वृत्त: भुजङ्गप्रयात ) 

वहावा उगा भार का तो शिरी हो
करावी कशाला उगा काळजी हो।
कृपा अंबिकेची हवी माणसाला
समर्था कृपा होत चिंता कशाला॥1॥

सुटे सर्व कोडे क्षणांती तदा हो
कृपाछत्र जेव्हा तुझे लाभते हो।
मही आणि आकाश पाताळ मध्ये
तुझा सर्व लोकांत डंका सदा हो॥2॥

शरण्याम्बिका तू तुला मागता हो
मिळे सर्व काही सुखाने सुखाने।
विपत्तीत मार्गां स्वयें धाडिशी तू
नमस्कार माझा तुला रेणुकेला॥3॥

जसे खड्ग हाती धरूनी शिवे तू
सुरां रक्षिले पूर्वकाली सदा हो।
तसे आज ही लेकरां रक्षिसी तू
नमस्कार माझा तुला रेणुकेला॥4॥

तुला प्रार्थिता हो मिळे इष्ट सर्व
तुला प्रार्थिता हो पळे कष्ट दूर।
तुला वंदिता हो मिटे ताप सारा
नमस्कार माझा तुला रेणुकेला॥5॥

मला पामराला तुझी भक्ति देई
नितांता अगाधा अशी भक्ति देई।
स्मरावे मला नाम आई तुझे हो
नमस्कार माझा तुला रेणुकेला॥6॥
© चन्द्रहासः।

Monday, 26 June 2017

आई अंबाबाई आई अंबाबाई

आई अंबाबाई आई अंबाबाई


चित्त राहो सदा आई तुझे पायी
आई अंबाबाई आई अंबाबाई

काया वाचे मने तुझे ध्यान घडो
आई अंबाबाई आई अंबाबाई

माझ्या मुखी सदा तुझे नाम येवो
आई अंबाबाई आई अंबाबाई

तुझे उपकार मला सदा स्मरो
आई अंबाबाई आई अंबाबाई

तुझ्या विना कुणा काही मी न मागो
आई अंबाबाई आई अंबाबाई

सांभाळी लेकरा करोनियां कृपा
आई अंबाबाई आई अंबाबाई 


विनवितो दास नाम चंद्रहास
आई अंबाबाई आई अंबाबाई

Saturday, 17 June 2017

गोमातेसी भजे जो सदैव।


 गोमातेसी भजे जो सदैव।

 © चन्द्रहास


गोमातेसी भजे जो सदैव।
उद्धरते कुळगोत्र तयाचे।।१।।

लाभते आयुष्य निरोगी।
सर्व सुख जगी पावतसे।।२।।

पूजितां कामधेनुकन्या।
दिलीपां वांछीत लाभले।।३।।

विश्वंभर राखितो धेनु।
वाजवोनी वेणु वृंदावने।।४।।

भारते देशे जन्म हा दुर्लभ।
त्याहूनी दुर्लभ भक्ती असे।।५।।

जळती त्याची पापे ही क्षणात।
वंदन गोमातेसी जो करीतसे।।६।।

जय श्रीकृष्ण!!! 

Saturday, 20 May 2017

श्रीजगदम्बा को विनती!

श्रीजगदम्बा को विनती!

आशीष से दूर है, जगदम्बा के
डरना उसी का काम है।
माई करती है सब कुछ अच्छा
सच्चा उस का नाम है॥1॥

बात सीधीसी सहज है यह
पर समझता कौन है।
अपने आप में विलीन तथा
माई से दूर मौन है॥2॥

हम यन्त्र है माई यन्त्री है
उसी का तन्त्र है।
सभ कुछ माई करती है
नाम ही मन्त्र है॥3॥

स्मरण कर सदा हृदय से
नाम गाते रहों।
माई के चरणों के पास
सदा आते रहों॥4॥

माई से दूर भयंकर भय है
पास अभय है।
माई से दूर सब मृण्मय है
पास चिन्मय है॥5॥

इक पलभर भी आप का
मुझे वियोग ना हों।
माई, विनती है आप से
ऐसा संयोजन हों॥6॥

©चन्द्रहासः।

Monday, 8 May 2017

हरीचे असावे।

 

 

हरीचे असावे।

डॉ. चन्द्रहास सोनपेठकर 







मुखी नाम माझ्या हरीचे असावे
हरीच्या विना चित्त कोठे नसावे।
हरीच्या पुढे हात जोडून पुन्हा
हरीसीच मागे हरीचे असावे॥1॥

तहानेस भूकेस न म्या स्मरावे
सदा सर्वदा चित्त पायी रमावे।
क्षणांच्या सवे नाम देवा घडावे
कणां अंतरी मी हरीला पहावे॥2॥

इथेही तिथेही कुठेही कधीही
धरे अंतरी गंध जैसा वसे हो।
मुखी नाम माझ्या मनी ध्यान माझ्या
असावे हरीचे सदा सर्वदा हो॥3॥

हरी देत आहे तरी काय चिन्ता
सखा राधिकेचा असे सर्वदाता।
मला पामराला हवे काय आता
मिळे सर्व काही विना मागता हो॥4॥

हरीच्या गुणां काय वर्णू कसे मी
निराकार ते रूप साकार नामी।
हरी वाजवी वेणु भक्तां समोरी
नमस्कार माझा मनेकायवाची॥5॥

हरी स्वप्न दावी हरीचीच सत्ता
हरी मुक्तिदाता हरी भुक्तिदाता।
नमस्कार कान्हा पुरस्कार कान्हा
नको विस्मरू हो हरी चन्द्रहासां ॥6॥

Monday, 1 May 2017

वह... ।

वह... ।

© चन्द्रहास


प्रासाद की ओर जाते पथ पर
जब होते है हमारे पैर।
पैरवी करने चले आते है तब
बिन आमंत्रण के गैर।1

उन गैरों को भी हों मेरा नमन
कर साधुवाद यापन।
हम पर निश्चित है उनका ऋण
हो सके उसका मापन।2

हम रुके रुके से, पैर थके थके से
करते है जिसका स्मरण।
और बनते उर्जावान स्मृतिमात्र से
शेष ही रहे उनका ऋण।3

वह स्मृति है, धृति है, मति है, नीति है
चैतन्य की आभा है।
मनगगन के चन्द्र की वह चांदनी है
काव्य की प्रतिभा है।4

वह अनुपम है, निराली है, अनूठी है
जयशिल्पकारिणी है।
वह सादगी है, वह अनाहत ध्वनि है
पराजयसाक्षिणी है।5

गिरते स्वत्त्व को उठाती कहानी है
वह सच में रुहानी है।
वह सत्संगति है, प्रगति है, स्वस्ति है
वह शाम सुहानी है।6

नमस्कार माझा महाराष्ट्रभूला।।

नमस्कार माझा महाराष्ट्रभूला।।

© डाॅ. चन्द्रहास सोनपेठकर

इथे थोर राजे तसे थोर संत
सुभक्ती सुशक्ती निराळीच माती।
इथे आसमंती निनादे मृदंग
नमस्कार माझा महाराष्ट्रभूला।।

इथे ज्ञान विज्ञानरूपी पताका
इथे दिव्य ओव्या नि गाथा नि दिंड्या।
इथे पेटती संक्रमाच्या मशाली
नमस्कार माझा महाराष्ट्रभूला।।

इथे देव जाते दळायास येई
इथे देव पाणी भरायास येई।
इथे देव लेकूरवाळाचि होई
नमस्कार माझा महाराष्ट्रभूला।।

मराठीत बोला मराठीस वंदा
मनी मान ठेवा भगव्या ध्वजाचा।
कवी चंद्रहासां सदा वंद्य माता
नमस्कार माझा महाराष्ट्रभूला।।

(वृत्त: भुजंगप्रयात)

Sunday, 30 April 2017

जो है वो तेरा है, मैया तेरा है ।

जो है वो तेरा है, मैया तेरा है ।

चन्द्रहास: ।


जो है वो तेरा है,  मैया तेरा है ।
मै भी तेरा हूँ,  मैया तेरा हूँ ।। १ ।। 

आँचल में छुपाओ, चरणों में बिठाओ ।
शरण में स्वीकारो, मैया मुझे अपनाओ ।। २ ।।

मैया तेरी शरण में, तिहुँ लोक रहते है । 
ब्रह्मविष्णुमहेशजी, तुम्हे पूजते है ।। ३ ।।

अभागा तो वही है, जिसने पूजा नहीं है ।  
अंधा तो वही है, जो तुम्हे देखा नहीं है ।। ४ ।। 

अब नहीं जाता रुकते, थका हूँ राह देखते । 
दरबार में बुलाओ माते, तुमसे करनी है बाते ।। ५ ।।

क्षमा करो माई, शरण दो माई । 
पास लो माई, दर्शन दो माई ।। ६ ।।  

Sunday, 9 April 2017

मानस स्नान

मानस स्नान।
© चन्द्रहासः।

भावत्व का जल हों
सुमिरन का साबून हों।
मन को निचोड कर धोयें
मद मत्सर मल बह जायें॥

मन का कोना कोना
बन जावें आईना।
मन में हों करूणा,
परमेश की स्थापना॥

दुख का न हों कारण
हों ईष्टदेव का आलंबन।
आनन्द का हों संगुणन
नित हों सन्तों का वंदन॥

चैतन्यसे जुडे जडता छोडे
परमतत्त्व की साधना करें।
मनुष्य का देह भारते जन्म
मानस स्नान से सार्थक करें॥

प्रतिदिन करे जो ऐसा स्नान
गो लोक मे पावें वह स्थान।
धरती करें उसका गुणगान
हास मानें वह तीर्थों के समान॥

Monday, 13 March 2017

रंग....! डाॅ. चन्द्रहास सोनपेठकर

रंग....!
डाॅ. चन्द्रहास सोनपेठकर

अजाणता रंग जाणता होतो
कधी जाणता अजाण होतो.
शहाणा रंग कधी बावरा होतो
कधी बावरा शहाणा होतो. ॥1॥

कधी रंग गंधित होतो
कधी गंध रंगीत होतो.
कधी रंग भ्रमित होतो
कधी गंध चित्रित होतो. ॥2॥

काळाचे ते कधी रंग वेगळे
रंगांचे आपुले स्वैर सोहळे,
स्मृतीगीतांचा सूर ओघळे
लाघव वेळी वेळ ना कळे. ॥3॥

कौतुकाचे रंग मनोहर
मत्सराचे दर्प भयंकर
मैतराचे रंग बहु सुन्दर
कातराची वेळ शुभंकर. ॥4॥

काय पश्चिम काय प्राचीचे
रंग समान स्वागत एकीचे
रंग असावे कोमल हास्याचे
कधी कधीच कौतुक नेकीचे. ॥5॥

रंगांची उधळण करू चला
रंग केसरीया उधळू चला
साथ देऊ साथ घेऊ चला
जीवनाचे चित्र सजवू चला. ॥6॥

Sunday, 5 March 2017

कवडसा असावा।

जगण्यात कवडसा असावा।
© चन्द्रहास सोनपेठकर

स्वप्न ऊरी असावे
स्वप्नासाठी जगावे।
स्वप्न जगणे व्हावे
जगणे स्वप्न न व्हावे॥

स्वप्नात दिवे असावे
जगण्यात उजेड असावा।
अंधारल्या रात्री स्वप्नावे
जगण्यात अंधार नसावा॥

स्वप्न आपलेच असावे
त्यात परकेपणा नसावा।
स्वप्नात हास्य असावे
जगण्यात कवडसा असावा॥
© चन्द्रहास सोनपेठकर

Thursday, 9 February 2017

सत्य की ओर देखों।

सत्य की ओर देखों।
© चन्द्रहास शास्त्री

अंतीम विजय होता है सत्य का
न जाने तब तक कितना झूठ चलता है।

सत्य बारंबार त्रस्त संत्रस्त होता है
झूठ तो बुढापे मे ही दंडित होता है।

तो क्यों हम सच को पाल बैठे है
आज मान्यवर जवाब आपको देना है।

उस बालक ने सिधे मुझसे प्रश्न किया
मैने भी उसको सिधे सिधे जवाब दिया।

झूठ की ओर तुम देखते क्यों हों
सच को अनदेखा करते क्यों हों।

मनुष्य जिसकी ओर देखता है
वैसा ही निश्चित बन जाता है।

कल से सत्य की ओर देखा करों
झूठ को नजरअंदाज तुम किया करों।

झूठ रोता होगा रातभर
सच आराम से सोता है
झूठ की चांदी पलभर
सच अनमोल हीरा होता है।

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...