Saturday, 6 August 2016

Shubhmitrdinam.

शुभमित्रदिनम्
अंतःकरणपूर्वक सभी मित्रों के प्रति कृतार्थता। मित्रता क्या है; यह कोई मेरे मित्रों से पुछो। शायद मै भी ठीक से ना बतां पाऊं। वह अवश्य बताएंगे। मेरे मित्रों ने मेरे लिए जो कुछ कीया, कर रहे है, वह अद्वतीय है। अतुलनीय है। वह निःस्सीम है। अमित है।
        आनंद शतवर्धित किया है। तथा समस्याएं न्यून। समस्याओं के समय, ऐसा मानो कवच बन जाते है मित्र, कि अनुभूत कीया यह केवल मित्र नही है, मां जगदंबा के अपार कृपा एवं प्रसाद का फलस्वरूप है।
        कभी लगता है, क्या यह सच है; ऐसा हों सकता है; इतना स्नेह....! रुधिर से भी श्रेष्ठ है मन का संबंध। महाकवि कालिदास कहते है, सज्जन बहोत सत्त्वरतया मित्र बन जाते है। सही है। मित्र बनकर मित्रता निभाते भी है।
        लगता है, मित्रता की व्याख्या 'मिलित्वा त्रायते' मिलकर रक्षण करते है, ऐसी ही होगी। मित्र शब्द का एक अर्थ 'सूर्य' भी है। सूर्य वह है जिस के पास कभी अंधेरा नही होता है। हर दम प्रकाश ही होता है। प्रकृति का नियम है, सूरज के अर्थात मित्र के प्रकाश से ही तो चन्द्रमा हंसता है, खिलता है।
        कितना भी लिखें,
        तो भी अपूर्ण रहें।
        मित्रता ऐसी दिव्य
        की सभी को भाएं॥
        शुभकामनाओं के साथ,
        जय श्रीकृष्ण!!!

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