Monday, 1 August 2016

हीरे की कथा।

हीरे की कथा।

कौन सयाना कौन है पागल
कोई नही है जानता।
हीरे को हीरा यहां पर
कोई नही है मानता॥

तराशना आता नही जिसे
वही बन बैठे है प्रमाता।
हीरे को कांच का तुकडा
कहने को लोग है आमादा॥

ऐ कांच के टुकडे,
हीरे को कितना तरसायेगा।
रो रहा हर चौराहा
उस की कहानी सुनाता॥

कांच से कोई अपना बैर
हीरा नही है कभी निभाता।
टूट जाने पर भी वह
कांच को खूबी से तराशता॥

अनमोल का मोल नही
पर वह बेमोल तो नही।
मोल चुंका नही पाते जिसका
उसे हि अनमोल कहां जाता॥

बात सिधी सी बहोत है
हर कोई यह है जानता।
अज्ञान का है बोलबाला
चूपचाप बैठी है विद्वत्ता॥

इक दिन अंधियारा जायेगा
हर तरफ बस् उजाला होगा।
कोई जोहरी साचा आयेगा
हीरे को तलाशता तराशता॥

उस दिन बोल उठेगी विद्वत्ता
न्याय करेगी प्रभुसत्ता।
हीरा सुशोभित मुकुट मे
दिखेगा मनोहर चमचमाता॥

No comments:

Post a Comment

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...