Friday, 16 December 2016

हसो, हसाओ।।

© चन्द्रहासः।


हसते रहो हसाते रहो
सिसकि मत सूनाओ।
चिर कितना भी फंटे
उसको फूलों से बुनाओ।।

ग्रीष्म भले हीे गहरा हों
मुख पर बसन्त दिखाओ।
नयनों से झलकता पानी हों
तुम वर्षा का जल ही बताओ।।

कभी हेमन्त शिशिर हों
तुम शरद ही दिखलाओ।
अन्तर से मत मुरझाओ
बाहर खिल कर ही जाओ।।

मेघों की गडगडाहट हों
तुम मृदंग की ध्वनि बताओ।
अन्तर मे यदि यमन हों
तुम भैरव के स्वर ही गाओ।।

पक्ष कृष्ण हों शुक्ल हों
तुम मन की उपज हों।
विराट को नमन करते
चन्द्र, तुम हसो हसाओ।।
 
जय श्रीकृष्ण!!!

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