करीतसे प्रभात श्रीहरी।।
डॉ चन्द्रहास सोनपेठकर
किती खरे बोलशील मना ।
जगी कसे राहशील मना।।1।।
जगी कसे राहशील मना।।1।।
कागदी फुलांत गंध शोधती।
बेगडी सुरात बोल बोलती।।2।।
बेगडी सुरात बोल बोलती।।2।।
सलाम ठोकती खुशाल रे।
मनात पेटती मशाल रे।।3।।
मनात पेटती मशाल रे।।3।।
तुला कधी जमायचे मना।
असे लटीक वागणे पुन्हा।।4।।
असे लटीक वागणे पुन्हा।।4।।
रहा खराच या जगात रे।
पहा खुशाल सावधान रे।।5।।
पहा खुशाल सावधान रे।।5।।
करू नकोस काळजी तरी।
करीतसे प्रभात श्रीहरी।।6।।
करीतसे प्रभात श्रीहरी।।6।।
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