मानस स्नान।
© चन्द्रहासः।
भावत्व का जल हों
सुमिरन का साबून हों।
मन को निचोड कर धोयें
मद मत्सर मल बह जायें॥
मन का कोना कोना
बन जावें आईना।
मन में हों करूणा,
परमेश की स्थापना॥
दुख का न हों कारण
हों ईष्टदेव का आलंबन।
आनन्द का हों संगुणन
नित हों सन्तों का वंदन॥
चैतन्यसे जुडे जडता छोडे
परमतत्त्व की साधना करें।
मनुष्य का देह भारते जन्म
मानस स्नान से सार्थक करें॥
प्रतिदिन करे जो ऐसा स्नान
गो लोक मे पावें वह स्थान।
धरती करें उसका गुणगान
हास मानें वह तीर्थों के समान॥
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