Monday, 1 May 2017

वह... ।

वह... ।

© चन्द्रहास


प्रासाद की ओर जाते पथ पर
जब होते है हमारे पैर।
पैरवी करने चले आते है तब
बिन आमंत्रण के गैर।1

उन गैरों को भी हों मेरा नमन
कर साधुवाद यापन।
हम पर निश्चित है उनका ऋण
हो सके उसका मापन।2

हम रुके रुके से, पैर थके थके से
करते है जिसका स्मरण।
और बनते उर्जावान स्मृतिमात्र से
शेष ही रहे उनका ऋण।3

वह स्मृति है, धृति है, मति है, नीति है
चैतन्य की आभा है।
मनगगन के चन्द्र की वह चांदनी है
काव्य की प्रतिभा है।4

वह अनुपम है, निराली है, अनूठी है
जयशिल्पकारिणी है।
वह सादगी है, वह अनाहत ध्वनि है
पराजयसाक्षिणी है।5

गिरते स्वत्त्व को उठाती कहानी है
वह सच में रुहानी है।
वह सत्संगति है, प्रगति है, स्वस्ति है
वह शाम सुहानी है।6

No comments:

Post a Comment

संध्या समा अशी ही .

संध्या समा अशी ही  . © चन्द्रहास शास्त्री षट्पाद बद्ध कोशी, संध्या समा अशी ही व्याधी नवी नवी ही, संध्या समा अशी ही .   केसांत माळलेली,...