जय श्रीकृष्ण कहने लगा
चन्द्रहास शास्त्री
इक समय ऐसा था कि
कौरवों का जमावडा था
कुछ कौरव नही थे
पर उनके हितैषी थे
मेरे कृष्णलला मुझे कहते
न सारे कौरव है,
न सारे उनके हितैषी है
तुम जो जैसा हों
संजोये रखो
मै तुम्हारे साथ हूं
तो अंतिम विजय तुम्हारी है
सत्पथ पर चलते रहो
कहीं क्षमा कहीं दुर्लक्ष करो
तो मैने कृष्णलला से कुछ मांग लिया
दिग्विजय की उस बेला मे
बस तुम्हारी अनुकम्पा का स्मरण रहे
जयकारे आप ही के लगे ठाकुर जी
बन्दा कुछ नही, उसे रब ने बचा लिया
लोग उस समय इतना ही कहते रहे
ठाकुर जी तब मंद मंद मुस्कुराने लगे
घुंघराले बाल उनकी शोभा बढाने लगे
मै नयनबाष्प से उनके चरण धोने लगा
जय श्रीकृष्ण कहने लगा, कहने लगा
होता हूं कभी स्तुतिमाला से शोभित
स्मरण करता हूं ठाकुर जी को
हृदय कमल मे देख उनको विराजित
अहंकार निश्चित ही होता है पराजित
No comments:
Post a Comment