पग भूमी पर, ऐसे व्योम बनो।
© चन्द्रहास शास्त्री
निर्लज्ज नही, निर्मम नही
निरालस बनो सदा।
निर्जन नही, निर्दय नही
निरागस बनो सदा।।
स्वार्थ नही; सीमित स्वार्थ पाप है।
बहती नदी बनो, ठहरा जल नही।।
विस्तीर्ण हृदय हो जिसका सहज
चट्टान भी लांघता है वही ।।
आंधी नही, तुफान नही
इक प्यारासा पवन बनो।
सैलाब नही, अकाल नही
इक प्यारासा पर्जन्य बनो।।
किस शाक पर कौन पंछी बैठा है
मित्रो, निश्चित कोई नही जानता है ।
अंतर से उस का मनोहर ध्वनि सुनो
भाषा नही पर भाव समझ आता है।।
अहंकार नही, हुंकार बनो
पाञ्चजन्य के समान बनो।
उत्कर्ष के नये आयाम बनो
पग भूमी पर, ऐसे व्योम बनो।।
निरन्तर रुके बिना थके बिना,
ध्येयपथ पर सदा चलते रहो।
जगद्गुरु है परमात्मा कल्याणकारी
उन पर अटल भरौसा करते रहो।।
जय श्रीकृष्ण!
चन्द्रहासः।
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